Awareness Image


एडॉप्शन से हम सबको जुड़ना है


एडॉप्शन एक खुबसूरत अनुभव है जिसके द्वारा हम अपनी इच्छाओं और ज़रूरतों को पीछे रख कर एक बच्चे से रिश्ता जोड़ लेते हैं.

हमारा विश्वास है कि एक सुखी परिवार हर बच्चे का अधिकार है. भारत में 6 करोड़ निराश्रित बच्चे हैं और लगभग 3 करोड़ निस्संतान दम्पति. फिर भी सालाना केवल 4000 से कम बच्चे गोद लिए जाते हैं. एक ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते हमारे आगे एक बहुत बड़ा कार्य है जिसके द्वारा गोद लेने की प्रणाली में सुधार हो सके और हर बच्चे को घर मिल सके. .

यह तभी मुमकिन है जब हम गोद लेने के बारे में अपने स्कूलों में बच्चों को पढ़ायें, फिल्मों के द्वारा जागरूकता पैदा करें, सकारात्मक भाषा का प्रयोग करें, माता पिता को सहूलियतें दें और एक अनुकूल वातावरण बनायें. हमारा दायित्व है कि हम एडॉप्शन को एक गौरवपूर्ण पहचान बनायें.




एडॉप्शन जैसे गंभीर विषय का हमारे पाठ्यक्रम में न होने से, फिल्मो में उसके नाटकीय चरित्रण के कारण, परिवारों में उसकी खुसर पुसुर होने की वजह से ज़्यादातर लोगो के मन में गोद लेने को लेकर आशंकाएं बनी रहती हैं. अधिकतर लोग यही समझते है कि गोद तो सिर्फ निस्संतान दम्पति ही लेते हैं. हमारी ज़्यादातर कानूनी व्यवस्था भी माता पिता के दृष्टिकोण से ही उपजित है. समय आ गया है कि अब हम सब मिलकर एक ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते इन भ्रांतियों को भंग करें और बच्चे के दृष्टिकोण से नयी व्यवस्थाएं बनायें. समाज में फैली इन मिथ्याओं को हमें तोडना है.

गोद सिर्फ निस्संतान दम्पति ही लेते हैं – आज गोद लेने वालों की संख्या में ऐसे माता पिता भी हैं जिनके पहले से ही बच्चे हो या जो निस्संतान की श्रेणी में न आते हों. केवल माता या केवल पिता भी आजकल बच्चा गोद लेते हैं. बच्चा गोद लेने का यह मतलब या ज़रुरत नहीं है कि आप बच्चे पैदा नहीं कर सकते.

बड़ा बच्चा परिवार में घुल मिल नहीं सकता – 80% माता पिता इसी वजह से 2 वर्ष के ऊपर के बच्चे को गोद नहीं लेते. न केवल बड़ा बच्चा ज्यादा ज़िम्मेदार होता है बल्कि उसका स्वास्थ्य भी बेहतर होता है.

बच्चे का रंग रूप माता पिता से मिलना चाहिए - इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण बात कोई हो ही नहीं सकती कि पड़े लिखे माँ बाप भी खुद के जैसे दिखने वाला बच्चा ही गोद लेना चाहते हैं. अगर हम खुद को पीछे रखें तो समझेंगे कि बच्चे न केवल रंग रूप म ेंबल्कि सीरत मैं भी हमसे बेहतर हो सकते हैं. उनका हमारे जैसा दिखना या होना कोई ज़रूरी नहीं है.

बच्चे को उसके गोद लेने के बारे मैं नहीं बताना चाहिए –यह सोच केवल उन माता पिता की हो सकती है जो खुद गोद लेने को लेकर आश्वस्त न हों. हमें यह समझना ज़रूरी है कि बच्चे को उसके परिवार से सम्बंधित सच बताना उसके हित में है. इससे बच्चे को अपनी पहचान समझने में आसानी होती है और स्वास्थय सम्बन्धी मामलों में भी उसका यह जानना आवश्यक हो जाता है